Friday, November 19, 2010

अल्छि ! म

मेरो अल्छिपनको सिमाना नै छैन
लाग्छ गरेर खाने जमाना नै छैन
निष्क्रिये प्राय भएको छ शरीर
ढुंगाको देउता बसने यो मंदिर !

तथास्तु भन्न हात के उचाल्नु ?
टिको लाउन निधार पनि थाप्दैन
कुहिएर जालान नैबेद्धहरू
खानलाई मुख पनि खोल्दैन !

मैले लेख्या हैन यो कविता
यो त मसि र कागजको कारण हो
दिमाग पनि लगाउँदिन म त
यो घोर अल्छ्याईँको उदाहरण हो !

Thursday, November 4, 2010

तिहार

बल्दछं दियो झिलिमिली
मनै रमाउने अहा !
स्वर्ग भन्नु यहिं नै हो
अंत खोज्नु कहाँ
बालेर दियो हर्षको
संकल्प साधना गरौं
सँधै होस तिहार यस्तो
मिलेर प्रार्थना गरौं

Sunday, September 26, 2010

अब दर्द नही रहा

कुछ तुने दिए थे
कुछ मेरे अपने थे
अब दर्द नही रहा

ज़ख्म वह भर गए
निशां भी मिट गए
तडपा था मैं कभी
अब दर्द नही रहा
कुछ तुने दिए थे
कुछ मेरे अपने थे
अब दर्द नही रहा

चाहता मैं भुलाना मगर
जेहेन मे बसा था मगर
सम्भाला ख़ुदको मैंने
दर्द मे अब तलक
अब दर्द नही रहा
कुछ तुने दिए थे
कुछ मेरे अपने थे
अब दर्द नही रहा


ना पुछूंगा ख़ुद से
ना पुछूंगा तुझ से
सवाले बेरुख़ी का
हालात से सिखा हूँ
मैं संभल चुका हूँ
अब दर्द नही रहा
कुछ तुने दिए थे
कुछ मेरे अपने थे
अब दर्द नही रहा

रेहने दो दोस्ती भी
यह रिश्ता है मेहंगा
दिल से जो कंगाल हो
दोस्ती ख़ाक निभाओगे?
तन्हा ही ख़ुश हूँ
अब दर्द नही रहा
कुछ तुने दिए थे
कुछ मेरे अपने थे
अब दर्द नही रहा



Wednesday, September 1, 2010

छायाँ

उज्यालोमा ,
छायाँ बन्छ शरीर
अनिश्चित आकार हुन्छ
विराट हुन्छ रूप पनी
तुक्ष रति हुन्छ फेरि
कालो छायाँ फैलिदै टाढा
भयावह देखिन्छ काया
डल्लो सानो, आकार घटी
हुन्छ टाउको खुट्टा मुनि
आफ्नो छायाँ कति प्यारो
सुम्सुम्याई हर घडी
भाग्न बाद्धय तुल्याई दिने
त्यों अन्धकार निर्मोही
विचरो ! विवश !
प्रकाश छैन लुक्न गयो
शरीर पनि तड्पिरह्यो
छ्टपट आत्मा भावबिह्वल
ज्योतिसंगै विलीन भयो
झुल्केला के ! अब फेरि ?
छायाँले साथ छोड़ी
अन्धकार मै रुन्गिरह्यो
अर्ध जिवीत शरीर बनी

Tuesday, August 17, 2010

मेरो इन्द्रधनुष

मेरो इन्द्रधनुष दुई रंगको
कालो सेतो अचम्मको
भावनाको सागरबाट
स्वप्नको आकाश सम्म
अहा! कति प्यारो छ
जीवनको दुई पाटो
हर्ष र बिस्माद संगै
जे हेर्दछु त्येही देख्दछु
त्येसैले म हाँस्दछु
आँखा चिम्ले अँध्यारै हो
खोलेर उज्यालो चुम्दछु
मेरो इन्द्रधनुष दुई रंगको
कालो सेतो अचम्मको

Tuesday, July 27, 2010

अभी और जीना है

तेरी याद में मैखाने में.. पेहेरों बैठा करते हैं , तो क्या हुआ गर पिना छोड़ दिया , गमे जिंदगी अभी और जीना है ....अभी और जीना है

Wednesday, April 28, 2010

मन चंचल

अविरल कहिंसे जलधारा
बनके नदी है बेहेती
मन चंचल न सुख पावे
हरपल मो से है केहती
कभी बावंरिसी भंवर मे
गोता खूब लगाए
उभरके फिर किनारा
पटवार भी न पहुँचाए
मनका सागर है गेहरा
गेहराई समझ न आवे
जो समझूँ मैं मनको
मन फिर भी न समझे